पूज्य आचार्य देव श्री रामचंद्र सूरीश्वरजी महाराजा वर्त्तमान समय के सर्वोत्कृष्ट प्रभावी गुरुदेव थे .
आपने कभी किसीको एक काम करने का भी आदेश या आग्रह नहीं किया था फिर भी आप के नाम से अनेक
महान कार्य सम्पन्न होते थे . आप मंत्र - तंत्र - डोरा - धागा से दूर रहेते थे फिर भी आप के भक्तो की संख्या
हजारो हजारो की थी . आप व्याख्यान में अध्यात्म की बाते अधिक करते थे , मनोरंजन कम , फिर भी
आप के व्याख्यान में भीड़ बन जाती थी . आप का सम्मोहन अद्भुत था .१२१ शिष्य - ३०० निश्रावर्ती
साधु - ५०० आज्ञावर्ती श्रमणी - सेकड़ो श्रीमंत भक्त - हजारो अनुयायी आपको आत्मीय सम्बन्ध से जानते थे .
लाखो लोग तक आप के नाम का जादु फैला हुआ था . अनेक तीर्थ का उद्धार , अनेक अनेक जिनालय की प्रतिष्ठा के कार्य ,
बहुसंख्य उपाश्रय एवं ज्ञानभंडार का निर्माण आप के पुण्य से सम्पन्न हुए थे . आप ने जो ऐतिहासिक कार्य किया था
वो अविस्मरणीय है दीक्षा का प्रचार . एक समय ऐसा था जब जैन समाज में दीक्षा लेना अशक्य सा हो गया था .
ऐसे समय में आप ने घर से भाग कर स्वयं प्रज्ञा से दीक्षा ली . उस समय विक्रम संवत १९६९ में जब आप दीक्षित
हुए तब संघ में १०० साधु भी नहीं थे . आप ने ७९ साल तक चारित्र पालन कर के विक्रम संवत २०४७ में अंतिम श्वास
लिया तब संघ में साधु-साध्वी की संख्या १०,००० तक पहुच चुकी थी . अतिशयोक्ति के बिना ये कहा जा सकता है कि
दीक्षा के विरोध में राजकीय स्तर से , आधुनिक नास्तिको के द्वारा जो भी अवरोध का निर्माण किया गया था उसे मार
हटाने में आप ने अपनी सारी ताकत लगा दी थी . अपने समकालीन महापुरुषों के आशीर्वाद तथा सहयोग लेकर आप ने
भारतीय संन्यास धर्म के विरोध की हवा शांत कर दी थी . अपने महत्त्व को प्रस्थापित करने का आशय आप के ह्रदय में
नहीं रहता था इस लिए इस महान कार्य का यश आप ने लिया नहीं .
विक्रम संवत २०६९ में आप की दीक्षा की शताब्दी है . आप के तीन सन्देश सदा याद रहेगे .
१ - साधु होना आत्मा के लिए आवश्यक है . साधु ना हो सको तो साधु होने का सपना देखो , साधु को आदर दो .
मरण के बाद अगले जनम में जैन धर्म वापिस पाने का एक ही रास्ता है , दीक्षा का प्रेम और दीक्षितो का
आदर . दीक्षा या दीक्षित की निंदा कभी ना करे .
२ - आज के समय में दीक्षा देने से पूर्व गुरु ने मुमुक्षु की पूर्ण परीक्षा लेनी चाहिए . योग्य आत्मा को दीक्षा देना
जितना जरूरी है उतना ही जरूरी है अयोग्य को दीक्षा ना देना .
३ - दीक्षा पालन में शिथिलाचार को अवकाश नहीं है . साधु आत्मा को याद रख कर जिये तो अनावश्यक
शिथिलता कम हो जाएगी . नाम कमाना या नाम बनाना यह साधु का लक्ष्य नहीं है . साधु का लक्ष्य है
आत्मा साधना के साथ संघ और शासन के भविष्य को सलामत रखना .
आप ने अपने जीवन में आचार्य के ३६ गुणों को आत्मसात किये थे . आप अंतरंग अनुभूति से सम्पन्न अध्यात्म पुरुष थे .
आप सत्यवादी थे , आप शास्र के ज्ञानी एवं प्रखर पुरस्कर्ता थे . आप ने समता का अटल अनुभव पाकर साधना को सिद्धि तक
पहुंचाया था . आप के पवित्र चरणों में अनंत वंदन .
દીક્ષા શતાબ્દી વર્ષે વંદના